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ROHINGYA MUSLIMS: Terror Or Terrified?

रोहिंग्या मुसलमान : आतंक और आतंकित?

वर्तमान समय में रोहिंगिया मुसलमानो के विषय में यह प्रश्न फिर चर्चा का विषय बन कर उभरा है क्या वास्तव में ये रोहिंगिया मुसलमान आंतक का चेहरा हैं या इन रोहिंगिया मुसलमानो का समुदाय बीती कई सदियों से बस आतंकित किये जाते रहे हैं। 
Rohingya
अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले ये रोहिंग्या मुसलमान वास्तव में विश्व के कई देशों में जिसमे भारत भी शामिल है, में आतंक का कारण बने हुए हैं य फिर अल्पसंख्यक समुदाय से आने के कारण बस आतंकित किये जा रहे है। रोहिंग्या मुसलमानो के आतंक और आतंकित होने के विषय में चर्चा करने से पहले इन रोहिंग्या मुसलमानो के विषय में कुछ विशेष तथ्यों के बारे में जान लेते हैं। 

कौन हैं ये रोहिंगिया मुसलमान?

वर्तमान समय में शरर्णार्थी के तौर दर-बदर भटकने वाले इन रोहिंग्या मुसलमानो को इनके अतीत के तौर पर अरकानी भारतीयों के तौर पर जाना जाता है। रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय मुख्य रूप से मुसलमान बाहुल्य व आंशिक रूप से हिन्दू जनसँख्या वाला समुदाय है। 
Alpsankhyak
अगर बात रोहिंग्या मुसलमानो के इतिहास की करी जाये तो 8वीं शताब्दी से रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार में बसे थे। म्यांमार (पूर्व में वर्मा) में 1400 ई. के आस -पास आरकइन प्रान्त के आस-पास बसने वाले ये रोहिंग्या मुसलमान, राजा के दरबार में नौकरो का कार्य करते थे। 

रोहिंग्या मुसलमान और म्यांमार 

वर्ष 1948 में म्यांमार को अंग्रेजो से आजादी मिली और आजादी की इस लड़ाई में इन रोहिंग्या मुसलमानो का भी प्रमुख सहयोग रहा। आज़ादी के शुरुआती वर्षों तक तो हालात रोहिंग्या मुसलामानों के पक्ष में रहे। इन्हे म्यांमार में इज़्ज़त, बराबरी के अधिकार व सरकारी पदों पर समान अवसर मिलते रहे। 

पुनः शरणार्थी 

1948 में म्यांमार को अंग्रेज़ो से आज़ादी मिली आज़ादी के बाद वर्ष 1960 से रोहिंग्या मुसलमानो के साथ आतंक भरे व्यवहार की शुरुआत हुई। म्यांमार, मुख्या तौर पर बौद्ध धर्म बाहुल्य देश है अतः म्यांमार में इन रोहिंगिया मुसलमानों को अल्पसंख्यक बताकर इन पर अत्याचारो की शुरुआत हो गई। 

वर्ष 1982 में म्यांमार का राष्ट्रीय कानून पारित हुआ तो इन रोहिंगिया मुसलमानो के सारे अधिकारों , नागरिकता आदि की समाप्ति कर दी गई। इन्हे सरकारी पदों से मुक्त कर दिया गया , सम्पत्ति , घर बनाने के अधिकार ,  प्रदर्शन करने के अधिकार आदि समाप्त कर दिए गए। मुख्य तौर पर कहे तो इन रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार में जनता के तौर पर मान्यता नहीं दी गई। 

रोहिंग्या मुसलमान के पलायन की शुरुआत   

म्यांमार के बहुसंख्यक बौद्ध वर्ग व सरकार द्वारा अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानो को म्यांमार की नागरिकता नहीं दी गई। मुख्य रूप से म्यांमार के आरकाइन (वर्तमान में रखाइन राज्य) में रहने वाले इन रोहिंग्या मुसलमानो पर अप्रैल 1992  में म्यांमार सरकार ने इनके बाहुल्य वाले क्षेत्र (आबादी लगभग 250000 से अधिक) में लगातार बढ़ रहे सैन्य गतिविधियों के कारण सैन्य हमला करते हुए इन्हे रखाइन राज्य से बाहर खदेड़ दिया। 
Rohingya
रखाइन राज्य म्यांमार की पश्चिमी सीमा पर बसा है। पूर्व में म्यांमार से खदेड़े जाने के कारण ये रोहिंग्या मुसलमान रखाइन के जनसँख्या रहित क्षेत्र में आकर बस गए। 

भारत और रोहिंग्या मुसलमान 

रोहिंग्या मुसलमानो का नाम भारत के बोध गया में होने वाले बम बिस्फोट से जोड़े जाने के कारण चर्चा का विषय रहा। IB ने इस हमले के बारे में इन रोहिंग्या मुसलमानो का सम्बन्ध होने का सिर्फ अनुमान लगाया था व उन्हें  इसका अन्य कोई आधार नहीं मिला था। 

भारत में अवैध रूप से बसे इन रोहिंग्या मुसलमानो को वापस भेजने की प्रक्रिया के लिए अप्रैल से न्यायलय में सुनवाई  शुरू होने वाली है। इस बारे में वर्ष 2017 में हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाले वकील हुनर गुप्ता ने याचिका दायर की थी व भारत में अवैध रूप से रह रहे इन रोहिंग्या  मुसलमानो को भारत के लिए खतरा बताते हुए जम्मू-कश्मीर से बाहर निकालने की मांग की थी। अधिवक्ता हुनर गुप्ता के अनुसार विगत 4 वर्षों में उनके द्वारा दायर की गई इस जनहित याचिका प्रशासन की तरफ से हाई कोर्ट में किसी भी प्रकार का संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया है।  

अब हाई कोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुए जम्मू-कश्मीर प्रशासन को  फटकार लगाई है व इस वर्ष अप्रैल 2021 में शुरू होने वाली सुनवाई में , भारत में अवैध रूप से रहने वाले इन रोहिंग्या मुसलमानो को वापस भेजने के  लिए प्रशासन द्वारा की जाने वाली कार्यवाही का जवाब माँगा है। 

हाल ही में जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा की जाने वाली कार्यवाही के कारण इन रोहिंग्या मुसलमानो के शिविरों में फिर से हलचल मच गयी है। इन्होने अपने शिविरों को छोड़कर परिवारों के साथ सुरक्षित स्थानों के लिए पलायन करना शुरू कर दिया है। 

अप्रैल 2021 में होने वाली हाई कोर्ट की सुनवाई से पहले जम्मू-कश्मीर प्रशासन के द्वारा इनके दस्तावेजों की जांच का कार्य पूर्ण करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है ताकि भारत में अवैध रूप से रह रहे इन रोहिंग्या मुसलमानो  को वापस भेजा जा सके। 

रोहिंग्या मुसलमानो के वर्तमान हालत : आतंक और आतंकित?

संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक रिपोर्ट में इन रोहिंग्या मुसलामानों के बारे में कहा गया है की रोहिंग्या मुसलामानों के समुदाय, दुनिया का सबसे ज्यादा व लगातार समय तक परेशान किया जाने वाला, दमन किया जाने वाला समुदाय है। 

इनकी तुलना अफ्रीकी देशों में होने वाले रंगभेद से की गई है। अगर बात इनके अधिकारों , हक़ की करी जाए तो, आंग-सान-सू-की हाल ही में जिनकी सरकार का तख्ता पलट म्यांमार की सेना के द्वारा कर दिया गया और जो म्यांमार में लोकतंत्र की स्थापना का श्रेय लेती हैं, खुद इन रोहिंग्या मुसलमानो की म्यांमार का नागरिक नहीं मानती है। 
Rohingya Muslims
अगर बात देश की सुरक्षा की हो तो फिर किसी भी प्रकार क्व समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन क्या इन रोहिंग्या मुसलमानो के अल्पसंख्यक समुदाय के स्थायित्व को लेकर कुछ बड़े फैसले वैश्विक स्तर पर बनी संस्थाओं के द्वारा स्पष्ट तौर पर लेने की आवश्यकता नहीं है?

हालांकि खतरे को कभी भी पूर्व अनुमानित या चिन्हित नहीं किया जा सकता है लेकिन आखिर कब तक इनके हितों का इसी प्रकार से दमन किया जाता रहेगा। क्या सर्फ आशंका भर से किसी का भी दमन किया जाना उचित हैं? क्यों कोई वैश्विक संगठन इस तरह  शरणार्थी समूहों के विषय में स्पष्ट तौर पर कोई रवैया नहीं दिखाता।  
इस प्रकार के वैश्विक संगठनों की स्थापना मानव हितों की रक्षा करने के लिए ही तो की गई है। अगर ये वैश्विक संगठन ही अपने जिम्मेदारियों का निर्वहन स्वतंत्रता व समान नजरिये के साथ नहीं कर सकते तो विश्व पटल पर इनके अस्तित्व की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। 

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